अनोखी सत्य कहानी: बिना स्त्री पुरुष के मिलन के पैदा हुई अलौकिक कन्या

सृष्टि पर जितने भी जीव हैं सभी का जन्म स्त्री पुरुष के मिलन से ही हुआ है। पुराणों के अनुसार जब सृष्टि का आरंभ हुआ तब ब्रह्मा जी ने अपने योग बल से मनुष्य की उत्पत्ति की। इस क्रिया में बहुत वक्त लगता था। 

ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को कठिन तप के बल पर प्रसन्न किया और सृष्टि को बढ़ाने  के लिए अन्य विधि जानने की विनती की। भगवान शिव अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए तत्पश्चात मैथुन क्रिया से सृष्टि की वृद्धि होने लगी। 

इतिहास में एक ऐसी कन्या हुई है जिसका जन्म स्त्री पुरुष के मिलन से नहीं हुआ। यह कन्या थी भगवान वेद व्यास जी की माता और महाभारत के भीष्म पितामह की सौतेली मां सत्यवती जिन्हें गंधा नाम से भी जाना जाता है। आईए जानें, इनके जन्म की अनोखी कहानी-  

राजा सुधन्वा वन में शिकार के लिए गए। पीछे से इनकी रानी रजस्वला हुई और उनके मन में गर्भधारण करने की इच्छा जागृत हुई। उन्होंने एक शिकारी पक्षी के माध्यम से राजा के पास संदेश भेजा। जिसमें उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर करी। राजा  ने उस पक्षी को एक पात्र में अपना वीर्य डालकर दिया और कहा इसे रानी को दे देना। 

शिकारी पक्षी ने रानी के पास जाने के लिए उड़ान भरी रास्ते में एक अन्य शिकारी पक्षी के साथ उसकी लड़ाई होने लगी। इसी बीच वीर्य का पात्र यमुना नदी में गिर गया। यमुना में ब्रह्मा जी के श्राप से एक श्रापित अप्सरा मछली रूप में रह रही थी। वीर्य का पात्र उसने ग्रहण कर लिया और वह गर्भवती हो गई। 

गर्भकाल का समय जब पूरा होने वाला था तभी एक मछुआरे के जाल में वह मछली फंस गई। इतनी बड़ी मछली को देखकर सभी मछुआरे बहुत हैरान हुए और इसे राजा सुधन्वा के दरबार में ले गए। राजा की आज्ञा से मछली का पेट काटा गया तो उसमें से एक बालक और एक बालिका निकली। 

बालिका के शरीर से मछली की गंध आ रही थी राजा ने उसे मछुआरे को दे दिया और यह बालिका मत्स्यगंधा कहलाई। बालक को राजा ने रख लिया। समय के साथ-साथ मत्स्यगंधा बड़ी होती गई उसके रूप यौवन में भी निखार आता चला गया। वह अप्सराओं की तरह बहुत सुंदर थी। 

मछुआरे पिता ने मत्स्यगंधा को नाव चलाना सीखा दिया। वह यात्रियों को नाव द्वारा  यमुना पार कराने का काम करने लगी। एक दिन ऋषि पराशर यमुना पार करने के लिए मत्स्यगंधा की नाव में बैठे और उस पर मुग्ध हो गए।

ऋषि पराशर ने उससे अपने प्रेम का इजहार किया और बोले,” वह उससे एक पुत्र उत्पन्न करने की चाह रखते हैं।

“मत्स्यगंधा ने कहा,” आपका और मेरा मिलन कैसे हो सकता है। आप ऋषि और मैं मछुआरे की कन्या। इससे मेरा कौमार्य भी भंग हो जाएगा।

” ऋषि बोले,” मेरी संतान को जन्म देने के बाद भी तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा फिक्र मत करो।

” मत्स्यगंधा मान गई। ऋषि पराशर ने अपने तप की शक्ति से चारों ओर घना कोहरा फैला दिया। फिर दोनों का मिलन हुआ। ऋषि पराशर के आशीर्वाद से मत्स्यगंधा के शरीर से आने वाली मछली की दुर्गंध खत्म हो गई और उत्तम सुंगध निकलने लगी। दोनों की संतान के रूप में महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ। 

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